मुलायम सिंह ने सियासत में आने के बाद धोती-कुर्ता को क्यों बनाया स्थायी पोशाक


हाइलाइट्स

मुलायम सिंह यादव ने छात्र जीवन में पैंट शर्ट तो पहना होगा कि लेकिन राजनीति में आने के बाद कभी नहीं
आखिर क्यों उन्हें लगता था कि धोती-कुर्ता ही उनके लिए परफेक्ट पोशाक है और कुछ दूसरा नहीं
मुलायम सिंह को कहते थे कि राजनीति में आने वालों को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं

मुलायम सिंह यादव भारतीय राजनीति के खांटी नेता थे. धरतीपुत्र नेता कहलाए. जमीनी नेता तो थे ही. जब वो राजनीति में आए, तब से उन्होंने धोती-कुर्ता को अपनी स्थायी पोशाक बनाया तो जिंदगीभर यही पहनते रहे. इसमें ही वह खुद को कंफर्टेबल पाते रहे. भारतीय राजनीति में अपना एक स्टाइल स्टेटमेंट होता रहा है. मुलायम को कभी लगा ही नहीं कि उनको कोई दूसरी पोशाक पहननी चाहिए.

वह अगर कभी विदेश भी गए तो इसी पोशाक में रहे. जब पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उनकी पोशाक सफेद धोती-कुर्ता और काले रंग की जैकेट थी. जब रक्षा मंत्री बने तो हमेशा इसी पोशाक में रहे. चाहे वो बहुत ठंडे इलाके में गए या उच्चस्तरीय मीटिंग में शामिल हुए. उनकी वेशभूषा यही रही.

60 के दशक में राजनीति में आए

मुलायम सिंह यादव का राजनीति में प्रवेश 60 के दशक के मध्य में हुआ था. तब तक वह टीचर बन चुके थे. पैंट शर्ट भी पहनते थे. लेकिन जब वह अपने राजनीतिक गुरु और समाजवादी नेता नत्थु सिंह की अगुवाई में सियासत में कूदे तो उनकी पोशाक भी बदल गई.

जब राजनीति में आए तो क्या पोशाक देखी

शायद इसकी वजह ये थी कि उन्होंने खुद नत्थु सिंह को सफेद धोती कुर्ता में देखा था. हालांकि 60 के दशक में ज्यादातर नेता यही पोशाक पहनते थे. जब वह राममनोहर लोहिया के संपर्क में आए तो उन्होंने देखा कि लोहिया हमेशा सफेद सूती धोती और खद्दर का कुर्ता पहनते थे. इसके ऊपर जैकेट. यूं भी 60 के दशक में आमतौर पर राजनीति में आने वाले नेताओं की पोशाक यही होती थी लेकिन इन नेताओं ने समय आने पर इसे बदला भी.

मुलायम ने राजनीति में आने के बाद सफेद रंग का धोती कुर्ता जो धारण किया तो हमेशा उसी में रहे. हालांकि शुरू में उन्हें सफेद गांधी टोपी में भी देखा गया लेकिन वो बाद के सालों में उतर गई. लेकिन हालिया सालों में समाजवादी पार्टी के चुनाव प्रचार में उन्हें लाल टोपी में देखा गया. (न्यूज 18)

55 साल के सियासी सफर में हमेशा धोती – कुर्ता

लेकिन मुलायम ने कभी नहीं बदला. करीब 55 सालों तक चले उनके सियासी सफर में हमेशा उन्हें सफेद धोती और सफेद कुर्ते में देखा गया, इसके ऊपर काले रंग की जैकेट. हालांकि शुरू में वह सफेद रंग की गांधी टोपी पहनते थे. लेकिन बाद में उनकी टोपी जरूर बहुत दिनों तक उनके साथ नजर नहीं आई. फिर समाजवादी पार्टी के हालिया चुनाव कैंपेन में वह सफेद धोती-कुर्ता और काले रंग की जैकेट के साथ लाल टोपी में दिखे. पैरों में चमड़े की काले रंग की सैंडिल पहनते थे.

विदेश भी गए तो इसी वेशभूषा में

उनका टेलर इलियास नाम का शख्स था, जो 30 सालों से कहीं ज्यादा समय से उनके लिए कुर्ता और जैकेट सिलने का काम करता था. कहा जाता है कई बार उनसे विदेश दौरों के समय और रक्षा मंत्री रहते हुए ठंडे इलाकों में जाने के समय पोशाक बदलने की सलाह दी गई लेकिन उन्होंने तुरंत इसे खारिज कर दिया.

Mulayam Singh Yadav
मुलायम सिंह यादव जब अपने नेताओं को पैंट शर्ट पहनते देखते थे तो उन्हें भी सलाह देते थे कि राजनीति की अपनी पोशाक है, जो उन्हें जमीन और जनता से जोड़ती है, लिहाजा उन्हें सफेद रंग का धोती कुर्ता या पाजामा कुर्ता पहनना चाहिए. (File Photo)

धोती – कुर्ता क्यों पहनने की सलाह देते थे मुलायम

मुलायम हमेशा से मानते थे कि राजनीति में आने वालों को साधारण वस्त्र पहनने चाहिए. वो अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी सफेद धोती कुर्ता या सफेद कुर्ता – पाजामा पहनने की सलाह देते थे. उनके कई नेताओं ने ये बात कही. वो जब सांसद या विधायक बने या या समाजवादी पार्टी की रैली, सभाओं  या मीटिंग में हिस्सा लेने पहुंचे और नेताजी यानि मुलायम ने उन्हें देख लिया तो तुरंत उन्हें बुलाकर ये सलाह जरूर दी कि हर पेशे की तरह राजनीति की एक पोशाक होती है, उन्हें धोती – कुर्ता या पाजामा-कुर्ता पहनना चाहिए. ये पोशाक आपको जमीन से जुड़ा तो दिखाती ही है जनता से करीबीयत का भी अहसास कराती है.

धोती परंपरागत प्राचीन पोशाक

धोती हमारी परंपरागत और प्राचीन पोशाक है. पुरुष आमतौर पर यही पहनते थे. पिछले दिनों एक सर्वे से जाहिर हुआ कि अब भी भारत में लुंगी, धोती और पाजामा-कुर्ता जैसे पोशाक कम लेकिन खरीदे जरूरजाते हैं. हमारे तमाम रीतिरिवाज और परंपराओं के लिए आमतौर पर धोती और कुर्ता को ही मान्य पोशाक माना जाता है. आमतौर पर ये फीट लंबी होती है. अब तो खैर सिल्क की धोतियों का भी रिवाज चल गया है. जो फैशन सिंबल माना जाने लगा है.

Mulayam Singh Yadav
वैसे धोती कुर्ता भारत की परंपरागत और प्राचीन पोशाक है. पहले इसे धवती कहा जाता था जो धीरे धीरे धोती में बदल गया. ये एक संस्कृत शब्द है. (File Photo)

ईसा से 500 सालों पहले से जिक्र 

धोती भारतीय प्राचीन परंपरा में लंबे समय से जुड़ी रही है. ईसा से 500 सालों पहले भी सिंधू वैली सभ्यता में धोती पहने पुरुषों के चित्र मिले. प्राचीन भारत में इसे पवित्र और साफ पोशाक माना जाता था. वैसे तो अगर आप उत्तर से दक्षिण भारत की ओर बढ़ेंगे तो इसे पहनने के तरीके भी कई तरह से मिलते जाएंगे.

धोती पवित्र और साफ पोशाक भी

वैसे पूरे भारत में अब भी अगर पूजा -पाठ का आयोजन होता है तो इसे ही पहनने का रिवाज है. प्राचीन भारत में कपास हमारे यहां खूब होता था और इससे काटन या सूती धोती बनाई जाती है. वैसे भी भारतीय उपमहाद्वीप के मौसम और जलवायु के लिहाज से ये बहुत माकूल पोशाक मानी जाती है – आरामदायक और पहनने में आसान.

कई नेता इसमें नजर आते रहे हैं

वैसे सियासत में अकेले मुलायम ऐसे नेता नहीं हैं, जिन्हें लगातार धोती कुर्ता पहने देखा गया लेकिन अब आमतौर पर ऐसे नेता ना के बराबरा हैं. भारतीय जनता पार्टी के राजनाथ सिंह जरूर हमेशा धोती कुर्ता और जैकेट में नजर आते हैं. वह भी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं. सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं और अब रक्षामंत्री हैं.

गांधी से लेकर कई प्रधानमंत्रियों की भी पोशाक धोती-कुर्ता

पश्चिम बंगाल में 24 साल तक मुख्यमंत्री रहे और विदेश में पढाई करके देश में लौटने वाले ज्योति बसु भी राजनीति में कदम रखने के बाद ताजिंदगी धोती-कुर्ता पहनते रहे. महात्मा गांधी तो खैर देश की आजादी की लड़ाई में कूदने के बाद घुटनों के ऊपर की धोती पहनने लगे थे लेकिन उनके फॉलोअर्स ने भी धोती और कुर्ता धारण कर लिया, जो आमतौर पर खादी का होता था.

बाद में भारत के प्रधानमंत्रियों में लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, चंद्रशेखर भी धोती कुर्ता ही पहनते रहे. वैसे भारतीय राजनीति में हर शीर्ष सियासतदां का अपना पोशाक स्टेटमेंट रहा है.

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