काले चावल को लगी नजर, नहीं मिल रहे ऑर्डर, खराब हो रहा 2 हजार क्विंटल

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चंदौली. चंदौली के काले चावल को नजर लग गई है. ऐसा हम यूं ही नहीं कह रहे हैं, एक तरह देश के प्रधानमंत्री और सीएम योगी आदित्यनाथ इस उत्पाद को लेकर बेहद उत्साहित हैं, वहीं ब्लैक राइस के निर्यात के लिए बनाई गई समिति की मानें तो इसके रिटर्न ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं. कलेक्टिव मार्क यानी विशेष उत्पाद की मान्यता मिलने के बावजूद कोरोना काल और उससे उबरने के बाद प्रसासनिक लापरवाही के चलते विदेशों में निर्यात पूरी तरह ठप हो गया है. हालात ये हैं कि पिछले साल के उत्पादन का 1300 क्विंटल चावल समिति की लेखाझोखी के मंडी समिति में पड़ा है, तो 700 क्व‌िंटल से ज्यादा चावल किसानों के घरों में पड़ा है.

उल्लखेनीय है कि काला चावल चंदौली की पहचान बन गया है. धान के कटोरे के रूप में चर्चित इस क्षेत्र में पौष्टिक चावल की खेती ने देश विदेश में अपनी पहचान बनाई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस काले चावल की खेती का जिक्र कई बार अपने भाषण में कई बार किया और‌ किसानों की आर्थिक शक्ति का आधार बताया, उसको खरीदने वाला अब कोई नहीं है. काले चावल की खेती की शुरुआत ठीक 3 साल पहले भाजपा की वरिष्ठ नेता मेनका गांधी के सुझाव पर प्रायोगिक तौर पर चंदौली जिले में की गई थी. उस दौरान पीएम मोदी ने तारीफ की तो स्थानीय किसान गदगद हो गए. चंदौली समेत आसपास के कई जनपदों में इसकी खेती शुरू हो गई लेकिन किसान इस बार इस धान की नर्सरी भी नहीं डालने जा रहे हैं. उनका कहना है कि इस के बाद उनकी उपज को न तो विदेशी खरीददार मिल रहे हैं और न ही देशी बाजार से ऑर्डर आ रहे हैं. हालात ये है कि 1300 कुंतल से ज्यादा धान समिति के माध्यम से मंडियों में सड़ रहा है और 700 कुंतल से ज्यादा धान किसानों के घरों में पड़ा हुआ है.

दरअसल 2018 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के सहयोग से मणिपुर से 12 सौ रुपये प्रति किलो की दर से 12 किलो चावल यहां के 12 किसानों को खेती के लिए दिया गया. परिणाम बेहतर मिला और किसानों की आय बढ़ाने के लिए शुरू किए गए इस प्रयोग का फायदा जिले के किसानों को मिला. अच्छी ब्रांडिंग की वजह से किसानों को काला चावल का न सिर्फ अच्छा दाम मिला, बल्कि पूरे देश में पहचान भी हुई. इसके बाद तत्कालीन जिलाधिकारी और किसानों के बेहतरीन समन्वय से इस खेती को लेकर किसान प्रोत्साहित हुए और आस्ट्रेलिया समेत कई सेशो में 2000 कुंतल से ज्यादा का एक्पोर्ट ऑर्डर मिला और किसानों को फसल के अच्छे दाम मिले लेकिन कोरोना काल आने के बाद अब किसानों के पास ऑर्डर नहीं हैं.

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