दुनिया का पहला ‘सेनेटरी पैड’ जिस पर बनी है पुरुष की फोटो, पढ़िए पैडमैन की पूरी कहानी


हाइलाइट्स

अब तक 50,000 लड़कियों को बांट चुके हैं अमित
महिलाओं को माहवारी के प्रति करते हैं जागरूक
एक कविता सुनने के बाद लिया था यह फैसला

रिपोर्ट: अंजलि सिंह राजपूत

लखनऊ: 2018 में अक्षय कुमार की फिल्म पैडमैन सुपरहिट गई थी. पैड को लेकर, सामाजिक उत्थान पर बनी फिल्म युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय रही थी. फिल्म में महिलाओं को पैड के प्रति जागरूक किया गया था. शायद आप सभी ने भी यह फिल्म देखी ही होगी. ऐसे ही एक ‘पैडमैन’ लखनऊ के जानकीपुरम में भी रहते हैं, जिनका नाम है, अमित सक्सेना है. जो वर्ष 2015 से हिम्मत नाम से अभियान चला कर महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन बांट रहे हैं.

अमित एक ओर जहां लखनऊ और नेपाल की लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन बांट रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ स्कूल कॉलेज में जाकर कार्यशाला के जरिए छात्राओं को मासिक धर्म के बारे में जागरूक भी कर रहे हैं. अमित, अब तक करीब 50,000 लड़कियों को नैपकिन बांट चुके हैं. अमित सक्सेना समाज में यह संदेश दे रहे हैं, कि लड़कियों को हर महीने होने वाली माहवारी कोई बीमारी नहीं बल्कि प्रकृति का दिया हुआ वरदान है, जिसे समझने की जरूरत है.

एक कविता बनी प्रेरणा स्त्रोत
अमित सक्सेना सृजन फाउंडेशन के नाम से संस्था भी चलाते हैं. वह बताते हैं कि वर्ष 2015 में उनके पिता अस्पताल में भर्ती थे. तब वो, दिन-रात अपने पिता के पास बैठे रहते थे. इसी दौरान खाली समय मिला तो वह लैपटॉप पर कुछ खोज रहे थे, तभी उनकी नजर माहवारी स्वच्छता दिवस मनाए जाने वाली खबर पर पड़ी. जिसके बारे में उन्होंने ज्यादा पढ़ना शुरू किया. इसके बाद उनके सामने दामिनी यादव की एक कविता आई. जो कि माहवारी के ऊपर लिखी गई थी. इस कविता में महिलाओं के उन दिनों के दर्द, स्थिति और समाज की सोच को बखूबी बताया गया है. इस कविता को पढ़ने के बाद ही उन्होंने ठाना कि अब, इसी विषय पर उन्हें आगे काम करना है.

पत्नी से बात करने में लग गए 3 दिन
पैडमैन अमित सक्सेना ने बताया कि जब उन्होंने इस विषय पर काम करने का मन बनाया तो वो सबसे पहले इसकी चर्चा अपनी पत्नी से करना चाहते थे. लेकिन उन्हें अपनी पत्नी से इस बारे में बात करने में 3 दिन लग गए थे. उन्होंने बताया कि जब उन्होंने अपनी पत्नी से बात की तो वह भी खुश हुईं और उन्होंने उनका पूरा सहयोग दिया.

पहला सेनेटरी पैड जिस पर बनी है पुरुष की फोटो
अमित सक्सेना जिन सेनेटरी पैड को बांटते हैं, वह पैड बाहर से मंगाए जाते हैं. उसकी पैकेजिंग वह खुद करते हैं. यह देश का पहला सेनेटरी पैड है, जिस पर एक पुरुष (अमित सक्सेना) की फोटो बनी हुई है. इसकी कीमत 30 रुपए है, लेकिन जरूरतमंद महिलाओं और लड़कियों को यह निशुल्क दिया जाता है.

गलतफहमियां हो रही हैं दूर
उन्होंने बताया कि स्कूल कॉलेज में जाते हैं, तो लड़कियां बताती हैं कि माहवारी के दौरान उन्हें अचार खाने से मना किया जाता है. पूजा करने, बाल धोने, नाखून काटने और बिस्तर पर सोने से भी मना किया जाता है. जबकि इसके पीछे कोई तर्क ही नहीं है. पुराने जमाने के लोगों ने संसाधनों की कमी की वजह से यह सब नियम बनाए हुए थे, जिसको आज भी लोग कायम रखे हुए हैं. जबकि इसके पीछे कोई भी शारीरिक और मानसिक रूप से अछूता तर्क नहीं है.

कामाख्या देवी की होती है पूजा
अमित सक्सेना ने बताया कि इस बात से हर कोई वाकिफ है कि, असम में 51 शक्तिपीठों में से एक कामाख्या देवी हैं. कामाख्या देवी में हर साल जून के महीने में देवी की मूर्ति से रक्त बहता है. जिस वजह से मंदिर को उस दौरान बंद कर दिया जाता है. यह बात किसी से छिपी नहीं है. इसी दौरान सबसे ज्यादा भक्त दर्शन करने जाते हैं. जब देवी की पूजा ऐसी परिस्थिति में सबसे ज्यादा मान्य होती है, तो घर की महिलाओं को इसमें अछूता कैसे समझा जा सकता है?

अब खुलकर करते हैं बात
महिला ज्ञानवती बताती हैं कि पहले वह इस विषय पर खुलकर बात नहीं कर पाती थीं. ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं कपड़ा इस्तेमाल करती थीं जिससे संक्रमण होने के बहुत ज्यादा मामले सामने आने लगे थे.

ऐसे में जब से अमित सक्सेना ने सेनेटरी नैपकिन बांटना शुरू किया है, तब से ग्रामीण क्षेत्र और गांव की महिलाओं की बहुत मदद हो रही है.

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