चिल्ड्रेन स्ट्रीट स्कूल: जिसका कोई नहीं उसका तो सतीश है यारो, मैं नहीं कहता ये मथुरा में लिखा है यारो… पढ़ें प्रेरक स्टोरी


हाइलाइट्स

सतीश शर्मा बताते हैं कि इस स्कूल के संचालन के लिए सरकार से किसी तरह का कोई अनुदान नहीं मिलता है.
सतीश ने बताया कि स्कूल की शुरुआत अकेले की थी, पर आज दर्जन भर लोग इन बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाते हैं.
बच्चों को खाने पीने की चीजें और कपड़े भी सतीश उपलब्ध कराते हैं, जो किसी न किसी के द्वारा गिफ्टेड होते हैं.

रिपोर्ट: चंदन सैनी

मथुरा. 1981 में आई फिल्म ‘लावारिस’ आप सबों को याद होगा. इस फिल्म में मुख्य किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाई थी. इसका गीत ‘जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा है यारो…’ बहुत लोकप्रिय हुआ था. मथुरा के सतीश शर्मा से मुलाकात के बाद अचानक यही गीत जेहन में गूंजने लगती है. वैसे बता दूं कि सतीश शर्मा और अमिताभ बच्चन का या फिल्म लावारिश से सतीश शर्मा का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है, फिर ऐसी क्या बात है कि सतीश शर्मा से मुलाकात के बाद लावारिस फिल्म का ये गीत याद आ गया. वजह आप खुद जान जाएंगे जब जानेंगे सतीश शर्मा के बारे में.

आस्था की नगरी मथुरा में पिछले 14 बरस से समाजसेवी सतीश शर्मा ज्ञान का दीपक जलाए हुए हैं. झुग्गी-झोपड़ी और बेसहारा बच्चों को शिक्षित करने के लिए सतीश शर्मा चिल्ड्रेन स्ट्रीट स्कूल चला रहे हैं. जहां बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ खाने पीने की चीजें और कपड़े भी उपलब्ध कराते हैं. मौजूदा समय में चिल्ड्रन स्ट्रीट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 300 के करीब है.

NEWS 18 LOCAL से सतीश शर्मा ने बताया कि 2008 में मैंने पहला स्कूल नवादा गांव में शुरू किया था. आज 3 सेंटर मथुरा में संचालित हैं. वे बताते हैं कि इसकी प्रेरणा उन्हें उनके पिताजी मिली है. उन्होंने कहा कि गरीबों के बच्चों को मेरे पिताजी नि:शुल्क शिक्षा देते थे. शिक्षा के लिए जागरूक करते थे. पिताजी की प्रेरणा से ही इन बच्चों को मैंने पढ़ाना शुरू किया.

कोई सरकारी अनुदान नहीं

स्ट्रीट स्कूल संचालक सतीश शर्मा बताते हैं कि इस स्कूल के संचालन के लिए सरकार से किसी तरह का कोई अनुदान नहीं मिलता है. सामाजिक संस्थाएं बच्चों के लिए कुछ दान देना चाहती हैं तो वह स्वयं आकर दान दे जाती हैं. किसी का बर्थडे होता है या किसी की शादी की सालगिरह होती है, तो वे अपने अनुसार बच्चों को बैग, जूते, चप्पल, बुक, स्टेशनरी का सामान दान दे जाते हैं. उसी से बच्चों का भरण-पोषण और शिक्षा का कार्य चल रहा है.

15 बच्चों से की थी शुरुआत

सतीश शर्मा बताते हैं कि जब स्ट्रीट स्कूल की शुरुआत की तो बच्चों की संख्या सिर्फ 15 थी. अकेले ही इन बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देने का काम शुरू किया. लेकिन आज एक दर्जन वॉलिंटियर्स सामाजिक कार्य की भावना से बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देते हैं. बच्चों को शिक्षा देने में जो भी वॉलिंटियर्स लगे हैं वे सेवा भावना से लगे हुए हैं. एक पैसा वह नहीं लेते हैं. अच्छी-अच्छी कंपनियों में कार्यरत हैं. सतीश के मुताबिक, इतने सालों बाद भी अगर मेरा हौसला बरकरार है तो सिर्फ इसलिए कि स्कूल में बच्चों की बढ़ती हुई संख्या मुझे ऊर्जा देती है.

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