Bhojpuri में पढ़ें- पौन इश्किया: इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान के कहानी


मोहल्ले के हर जवान लइका आपन आधा-अधूरा प्यार के परवान चढ़ावे खातिर लगा रहत रहल, जौन कभहूं न पूरा भयल. डेढ़ क कौन कहै एको नाही रह सकल उनकै इश्क. इहै कहानी हवे पौन इश्किया के, जेकरा एक अदद किरदार ग़लती से हमहूं रहलीं.

शायद ऊ साल 1982 रहल, जब हम हाईस्कूल में पढ़त रहलीं. स्कूल हमरा घर मम्फोर्डगंज से 5-6 किलोमीटर दूर रहल रामबाग में. स्कूले के एक टीचर रामफेर श्रीवास्तव से ट्यूशन लेत रहलीं. स्कूले से चल जात रहलीं ट्यूशन, और फिर शाम के थका-मांदा घर लौटत रहलीं. रोजाना 12 किलोमीटर साइकिल चलावे से गोड पिराय लागल. न हमे ट्यूशन जाय नीक लगत रहल न हमरी अम्मा के. एही दौरान हमार पड़ोसी मित्र शिवानंद हमका कुछ अइसन खास बतवलन कि हम तय कर लेहलीं कि अब ट्यूशन के खातिर रामबाग न जाइब. अम्मा के सेफला के बतवलीं कि अम्मा बड़ा दूर हवे ट्यूशन, जबकि शिवानंद पासे में जाएलन ट्यूशन पढ़े मोहल्ला में भीमसेन के इहां. उहां तो बड़ता भइयौ पढ़ले हवन. अम्मा तो समझबे कइलीं, बाबुओ जी के समझा देहलीं. प्रस्ताव दूनों सदन से पास हो गइल अउर अगले दिन हम भीमसेन की कोचिंग में हाजिर हो गइलीं.

इहां भीमसेन क जिक्र करब जरूरी हवे. ओनकर असली नाम शायद विश्वनाथ रहल, लेकिन शरीर भीमसेन वाला रहल. बियाहे बाद बेटी विधवा हो गइल रहल, इहे धक्का दिमाग में लागल रहल भीमसेन के. तबसे ओनकर दिमाग स्थिर ना रहत रहल. लेकिन गणित पढ़ावे में कउनो सानी ना रहल ओनकर. भीमसेन के कोचिंग में मोहल्ला का 4-5 लड़कियन पढ़त रहलीं. ओनहीं में से एक के जिक्र हमार अजीज दोस्त शिवानंद हमसे कइले रहलन. एकरे बाद तो खाली हमरे कोचिंग के रास्तै ना बदलल, हमार मकसदौ बदल गइल. पहली बार देखलीं मनी के, जइसन बतउले रहलें शिवानंद, ओसे अउर बेहतर. मनी ओकर असली नाम ना रहल, एसे मिलत जुलत दूसर रहल. असली नाम ए खातिर ना बतावत हवीं कि ओकर छोटका भाई अब गबरू जवान हो गइल होई. कब हमका चांप देई कउनो भरोसा न हवे.

बहरहाल, नवका ट्यूशन में हमार मन रमे लगल, हमार का सबकी क मन रमत रहल. आखिर रमे के मसदद जौन रहल. भीमसेन अपने घर के बरामदे में पढ़ावत रहलें, लड़के दरी पर बइठत रहलें और बगल के कमरा में खाट पर लकड़ियन बइठैं. सीन कुछ मुगलिया दरबार जइसन लागत रहल, जहां दरबार में मर्दन के बइठे के व्यवस्था होत रहल अउर मेहरारू पर्दानशीं रहत रहलीं. बरामदा में कमरा के दरवाजा के पास भीमसेन अपने तख्ता पर विराजैं अउर जमीन पर हम सब बइठी. जे भीमसेन के नगीचे बइठत रहल उसे लडकियन के दीदार कर सकत रहल. लेकिन भीमसेन के पास में बइठब सहल न रहल. न जाने कब का पूछ बइठैं भीमसेन अउर का दण्ड तय कर देंय, इ तो न भगवान बता सकत रहलन न खुद भीमसेन. उहे लइका उनके चरणाश्रय में नानसुख ले सकत रहल, जे पाइथागोरस क प्रमेय सिद्ध करे के माद्दा रखत रहल. एहीं हम अउर शिवानंद फायदा उठावत रहलीं. बस, न जाने कब दिल क तार झनझनावे लगल, मन किल्लोल करे लगल. हम तृप्त आत्मा से शिवानंद के भूरि-भूरि प्रशांसा कइलीं, सन्मार्ग बतावे खातिर धन्यवाद ज्ञापित कइलीं अउर आगे के कार्यसिद्धि के लिए ईश्वर के याद कइलीं.

हमरे घरे के पिछवाडे वाली सड़क पर मनी के घर रहल. ओनके पिता जी के बारे में तो ज्यादा ना जानत रहलीं लेकिन मनी अपने भाई अउर अम्मा के साथे नाना के घर रहत रहल. नाना डिस्टलरी में केमिस्ट रहलें शायद. ओ लाइन में सिर्फ 5 घर रहलन, जेहमे बीच के तीन घर के लड़कियन कोचिंग के शोभा बढ़ावत रहलीं. शुरुआत में मनी से पढ़ाई के कुछ बात भइल, फिर ई सिलसिला शुरू हो गइल. हम दूनो दोस्त आपन टेंडर डारे में जुटल रहलीं, ई सोच के कि केहू के पास हो टेंडर. मनी के घर में हम दूनों के आना जाना बढ़ गइल. एकर खामियाजा इ भइल कि ओनके अम्मा के कुछ काम करेके पड़त रहल. लेकिन जुनूनी हमहूं कम ना रहलीं, गाहे बहागे कर देत रहलीं कुछ न कुछ काम. एक बार त गजबे हो गइल, ओनके माई खबर भेजवउलीं की कुत्ता गायब हो गइल बा. हम अउर शिवानंद मौके पर पहुंचलीं पुलिस की तरह, जानकारी हासिल कइलीं. मनी के हिम्मत बधवलीं कि हम तोहार कुकुर ढूंढ के लाइब, कुकुर खातिर आपन लोर न बहावा, बड़ा अनमोल हवे तोहरा लोर. एकरे बाद शुरु भइल कुकुर सर्च अभियान. शिवानंद हांफत कि साइकिल से सड़क नापत रहलन अउर हम आपन पुरान स्कूटर ले के मोहल्ला के गलियन में मनी के कुकुर खोजत रहलीं. दरअस्ल मनी क कुकुर खुदे एक परजात कुतिया के फेर में रहल. शिशु मंदिर के पास वाली गली में प्रेमालाप से पहिलहीं धरा गइलन. कुकुर घर लउटल, मनी के लोर गिरब बंद भइल. लेकिन मेहनत हम और शिवानंद कइलीं अउर पप्पी-झप्पी कुकुरवा के मिलल. एतना जरूर भइल कि ऑनरेरियम के तौर पर मनी हमार हाथ पकड़ के कहलीं थैंक्यू. तबले ओनके अम्मा मिठाई अउर पानी के गिलास थमा देहलीं, जउन संकेत रहल कि जेकर जरूरत घर के रहल ऊ आ गइल बा, अब जवन गैरजरूरी हवे ऊ जा सकेला.

लेकिन हमरो जुनून जारी रहल. मनी के छोटा भाई अक्सर हमरे बंगला में भरी दोपहरी आ जात रहल जंगलजलेबी के फली खाए खातिर. मनी के बतवले रहल कि बबलू भइया के बंगले से जंगल जलेबी लाइला. हमहूं लू के परवार किहे बिना लग्घी ले के दौड़त रहती ए पेड़ से ओ पेड़, इ सोच के कि सब्र क फल जगल जिलेबी की तरह मीठा होई. लेकिन भगवानों बड़ा कारसाज हवन. हम अउर शिवानंद रोज दिहाड़ी मजदूर की तरह हिसाब लगावत रहलीं कि आपन इश्क के गाडी कहां तक पहुंचल. लेकिन ओहर मोहल्ला के एक ठाकुर परिवार क बिगड़ा शाहजादा क दिल ओहीं अटका रहल, जहां पहिले से कई पतंग पेंच लड़ावे खातिर उलझी रहलीं. दूनों के परिवार बिहार क रहल, लिहाजा पहिले से पहिचान रहल होई. बस ठाकुर साहब उठा ले गइलन एही बात के फायदा. एक दिन खबर आइल कि अबकी बार कुकुर नाहीं बल्कि मनी घरे से नदारद हवीं. हम अपने साथी शिवानंद की ओर शोले पिक्चर के जय की तरह बोललीं.. का कहेला.. हेड या टेलं? शिवानंद कहलन, रहेदा भाई, अबतक त बड़का ठाकुर न जाने कहां पहुंता होई मनी संगे. शायद हम्मे ईश्क में फना होए से पहिलहीं हमार इश्क फना हो गइल. मनी के एक चौथाई इश्क के सहारे हम दूनों के एक-एक चौथाई इश्क मिलि के पूरा एक न भइल, पौनै रहि गइल. बस इहे कहानी हवे हमार पौन इश्किया के.

(करुणेश त्रिपाठी भोजपुरी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri



Source link

more recommended stories